Tuesday, July 11, 2017

अध्याय-10, श्लोक-21

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
मैं आदित्यों में विष्णु, प्रकाशों में तेजस्वी सूर्य, मरूतों में मरीचि तथा नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।
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बारह आदित्यों की श्रेणी में 
मैं विष्णु हूँ प्रधान आदित्य 
जितने भी ज्योतिपुँज जग में 
उन सबमें हूँ मैं तेजस्वी सूर्य।

मैं वायु का अधिष्ठाता मरीचि 
जितने भी है वायु प्रवाहमान
नक्षत्रों की टोली में हूँ मैं चंद्रमा 
सौम्य, शीतल, प्रकाशवान।।

अध्याय-10, श्लोक-20

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
हे अर्जुन! मैं समस्त जीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अंत हूँ।
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हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों के
हृदय में सदा ही स्थित रहता हूँ
परमात्मा रूप में रहकर भीतर
मैं ही हर जीव को चेतना देता हूँ।

मुझसे ही सबकी हुई है उत्पत्ति
मैं ही उनका भरण भी करता हूँ
मैं उनके जीवन का कारण और
मैं ही मृत्यु का कारण बनता हूँ।।

अध्याय-10, श्लोक-19

श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
श्रीभगवान ने कहा-हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा क्योंकि हे अर्जुन! मेरा ऐश्वर्य असीम है।
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हे कुरुश्रेष्ठ! मेरे तो ऐश्वर्य अनंत
सबको यहाँ कहा न जा सकता
इतना विस्तार मेरे व्यक्तित्व का
कि समय में वो समा न सकता।

भगवान ने कहा अर्जुन से कि
बता रहे हैं अब वे अपने वैभव
बताएँगे मुख्य-मुख्य ही क्योंकि
सबको बता पाना नहीं है संभव ।।

Saturday, June 24, 2017

अध्याय-10, श्लोक-18

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ॥ १८ ॥
हे जनार्दन! आप पुनः विस्तार से अपने ऐश्वर्य तथा योगशक्ति का वर्णन करें। मैं आपके विषय में सुनकर कभी भी तृप्त नहीं होता हूँ क्योंकि जितना ही आपके विषय में सुनता हूँ, उतना ही आपके शब्द-अमृत को चखना चाहता हूँ।
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आपके विषय में जितना मैं सुनूँ  
उतनी ही बढ़ती जाती लालसा
इस अतृप्त हृदय को सदा रहती 
इन अमृत वचनों की अभिलाषा।

हे जनार्दन! जग के स्वामी प्रभु 
अपने ऐश्वर्यों को पुनः बताए 
अपनी योगशक्ति के विषय में 
तनिक फिर से हमें समझाएँ ।।

अध्याय-10, श्लोक-17

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
हे कृष्ण! हे परम योगी! मैं किस तरह आपका चिंतन करूँ और आपको कैसे जानूँ? हे भगवान! आपका स्मरण किन-किन रूपों में किया जाय?
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हे योगेश्वर! हे भगवन! बताए 
कैसे हम आपको जान पाए 
कैसे मन आप में हम लगाए 
कैसे आपका चिंतन कर पाए?

किस-किस भाव में भजे हम 
किस-किस रूप का ध्यान धरे 
कैसे हम आपको जाने-पहचाने 
आपको पाने के लिए क्या करे?

अध्याय-10, श्लोक-16

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्वर्यों को बताएँ जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं।
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कैसे रहते हैं आप व्याप्त
इस सृष्टि के कण-कण में
समस्त लोकों में हर समय
उपस्थित कैसे हर क्षण में।

ये अलौकिक दिव्य ऐश्वर्य
प्रभु हमें विस्तार से बताए
आपके सिवा कौन समर्थ
जो हमें ये वैभव समझाए।।

Wednesday, June 21, 2017

अध्याय-10, श्लोक-15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
हे परमपुरुष, हे सबके उद्गगम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे ब्रह्मांड के प्रभु! निस्सन्देह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अंतरंगाशक्ति से जानने वाले हैं।
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हे पुरुषोत्तम, हे सबके आदि प्रभु 
ब्रह्मांड नायक हे  सृष्टि के स्वामी
हे देवों के देव हे आदिदेव भगवन 
स्वतंत्र, स्वराट आप प्रभु अंतर्यामी।

एकमात्र आप ही स्वयं को जानते 
अन्य कोई नहीं है इस त्रिभुवन में।
आप चाहो तो कोई जाने आपको 
जब देते ज्ञान आप बैठ अंतर्मन में।।