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Tuesday, October 18, 2016

अध्याय-2, श्लोक-72

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
यह आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। यदि कोई जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह स्थित हो, तो वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है।
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ईश्वरीय जीवन का है पथ यह 
अध्यात्म के रस में डूबा हुआ है।
जिसने भी चुना इस जीवन को 
जग से नही वो मोहित हुआ है।।

इस पर चलने में कभी देर न होती 
यह सदा सर्वदा ही खुला रहता है।
अंतिम समय में भी अगर अपना ले 
तो भी पथिक परम धाम पाता है।।


******गीता का सार नाम का दूसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ*******

अध्याय-2, श्लोक-71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥ 
जिस व्यक्ति ने इन्द्रिय तृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शांति को प्राप्त कर सकता है।
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इंद्रियों को तृप्त करने की इच्छा 
जिसने सर्वथा परित्याग दिया है।
अपने चंचल मन को भी जिसने 
समस्त इच्छाओं से मुक्त किया है।।

ऐसा व्यक्ति ही मन को जीत कर 
मोह,अहंकार से रहित हो जाता है।
ऐसी दिव्य अवस्था में पहुँचकर ही 
व्यक्ति शांति का परम सुख पाता है।।

अध्याय-2, श्लोक-70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं 
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे 
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
जो पुरुष समुद्र में निरंतर प्रवेश करती रहनेवाली नदियों के समान इच्छाओं के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता और जो सदैव स्थिर रहता है, वही शांति प्राप्त कर सकता है, वह नहीं, जो ऐसी इच्छाओं को तुष्ट करने की चेष्टा करता हो।
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जैसे दृढ़ प्रतिष्ठा वाले पूर्ण समुद्र को  
नदियाँ विचलित किए बिना समाती।
उसी भाँति स्थिरबुद्धि पुरुष के मन में  
इच्छाएँ विकार उत्पन्न नही कर पाती।।

ऐसा प्रतिष्ठित प्रज्ञा वाले  मनुष्य ही 
जीवन में शांति का सुख ले पाते हैं।
वरना इंद्रिया को तुष्ट करने वाले तो 
जीवनपर्यन्त  अशांत ही रह जाते हैं।।

अध्याय-2, श्लोक-69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
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रात के समय जब सारा संसार 
स्वप्न लोक में समाया रहता है।
आत्म संयमी मनुष्य उस समय  
आत्म-साक्षात्कार हेतु जगता है।।

सांसारिक काम में लगने को जब 
समस्त प्राणी नींद से जगता है।
वह समय स्थिर प्रज्ञ मुनि को तो 
रात्रि के समान अँधेरा लगता है।।

अध्याय-2, श्लोक-68

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥
अतः हे महाबाहु! जिस पुरुष की इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों से सब प्रकार से विरत होकर उसके वश में हैं, उसी की बुद्धि निस्सन्देह स्थिर है।
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इंद्रियों के इतने विषय जग में 
जिनपर वह मोहित होती रहती।
पर कुछ ऐसे भी पुरुष भी होते 
जिनकी इंद्रियाँ वश में है होती।।

उनके विषयों से हटा इंद्रियों को 
जो उन्हें अपने वश में रख पाते हैं।
हे महाबाहु! ऐसे संयमी पुरुष ही 
जग में स्थिर बुद्धि के कहलाते हैं।।

अध्याय-2, श्लोक-67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥ 
जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को प्रचण्ड वायु दूर बहा ले जाती है उसी प्रकार विचरणशील इंद्रियों में से कोई एक जिस पर मन निरंतर लगा रहता है, मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है।
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इंद्रियाँ सदा संसार में है विचरती 
और मन को अपने पीछे है भगाती।
जिस पर मन निरंतर लगा रहता है 
वही सबसे अधिक उत्पात मचाती।।

पानी में तैरती हुई नाव को वायु 
अपने वेग से दूर बहा ले जाती है।
वैसे ही मन की कोई प्रिय इन्द्रिय 
बुद्धि को हरकर  उसे भटकाती है।।

अध्याय-2, श्लोक-66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥ ६६ ॥ 
जो कृष्णभावनामृत में परमेश्वर से सम्बंधित नही है उसकी न तो बुद्धि दिव्य होती है और न ही मन स्थिर होता है जिसके बिना शांति की कोई सम्भावना नहीं है। शांति के बिना सुख हो भी कैसे सकता है?
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भगवान से जिसने नाता नही जोड़ा 
उसकी बुद्धि कभी दिव्य नही होती।
मन भी उसका चंचल ही रहता और  
मति कभी उसकी स्थिर कहाँ होती।।

ऐसे अस्त-व्यस्त जीवन में कभी भी 
शांति की होती कोई सम्भावना नही।
शांति के बिना सुख आए जीवन में 
आज तक कभी हुआ है ऐसा कहीं?

अध्याय-2, श्लोक-65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥
इस प्रकार भगवान की कृपा प्राप्त होने से सम्पूर्ण दुःखों का अन्त हो जाता है तब उस प्रसन्न-चित्त मन वाले मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही एक परमात्मा में पूर्ण रूप से स्थिर हो जाती है।
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भगवान के अहैतुकी कृपा जब 
मानव के ऊपर ऐसे बरसती है।
सारे क्लेश उसके मिट जाते हैं 
दुःख उससे अब दूर ही रहती है।।

प्रसन्नता उसके जीवन में फैलती   
वह सदा प्रसन्न चित्त ही  रहता है।
बुद्धि पूर्ण रूप से प्रभु में स्थिर है  
अब संसार में नही वह  बहता है।।

अध्याय-2, श्लोक-64

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥
किंतु समस्त राग तथा द्वेष से मुक्त एवं अपनी इंद्रियों को संयम द्वारा वश में करने में समर्थ व्यक्ति भगवान की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है।
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लेकिन जो समस्त राग और द्वेष से 
मुक्त हुआ निर्मल मन का होता है।
इंद्रियों को अपनी संयमित कर सके
जिसके अंदर इतना सामर्थ्य होता है ।।

वह निश्छ्ल हृदय वाला व्यक्ति तो 
भगवान को अतिशय प्रिय है लगता।
इसी धरा धाम पर रहते हुए भी वह 
प्रभु की  पूर्ण कृपा प्राप्त है करता।।


अध्याय-2, श्लोक-63

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
क्रोध से पूर्ण मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मरणशक्ति का विभ्रम हो जाता है। जब स्मरणशक्ति भ्रमित हो जाती है, तो बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य भव-कूप में पुनः गिर जाता है।
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क्रोध जन्म देता है पूर्ण मोह को 
मोह से स्मरणशक्ति में भ्रम होता।
भ्रमित स्मरणशक्ति में तो मानव 
अपना विवेक तब भी है खो देता।।

जिसके विवेक का नाश हो जाए 
उसका तो पतन निश्चित है होता।
मोह और भ्रम से भटका वह मानव  
बारम्बार इस भव सागर में गिरता।।

अध्याय-2, श्लोक-62

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
इन्द्रियविषयों का चिंतन करते हुए मनुष्य की उनमें आसक्ति हो जाती है और ऐसी आसक्ति से काम उत्पन्न होता है और फिर काम से क्रोध प्रकट होता है।
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इन्द्रिय विषयों का चिंतन करने से
मनुष्यको उनमें आसक्ति हो जाती।
फिर यह विषयों की आसक्ति उसे
उन्हें पाने के लिए भी है उकसाती।।

हर हाल में उसे पाना ही चाहे मनुष्य 
जब विषय की कामना उत्पन्न होती।
जब पूरी नही हो पाती इच्छा उसकी 
तो यही क्रोध को आगे जन्म है देती।।

अध्याय-2, श्लोक-61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
जो इंद्रियों को पूर्णतया वश में रखते हुए इन्द्रिय-संयमन करता है और अपनी चेतना को मुझमें स्थिर कर देता है, वह मनुष्य स्थिरबुद्धि कहलाता है।
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वेगवती इंद्रियों को वश में करके 
जो जीवन को संयमित कर लेता।
संसार के भटकन से समेट कर जो 
अपनी बुद्धि मुझने स्थिर कर देता।।

वह व्यक्ति ही इंद्रियों को जीतकर 
संसार से मोहित नही हो पाता है।
मुझमें अपनी चेतना प्रतिष्ठित कर 
वह संयमी स्थिरबुद्धि कहलाता है।।

Monday, October 17, 2016

अध्याय-2, श्लोक-60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
हे अर्जुन! इंद्रियाँ इतनी प्रबल तथा वेगवान हैं कि उस विवेकी पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं, जो उन्हें वश में करने का प्रयत्न करता है।
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हे अर्जुन! जीव की चंचल इंद्रियाँ 
बड़ी ही प्रबल व वेगवती होती हैं।
मन को सदा विषयों में भटकाती 
औ बुद्धि को भ्रमित करती रहती हैं।।

कोई विवेकी पुरुष करे प्रयास कि 
इन इंद्रियों को अपने वश में कर ले।
तो उससे पहले ये बलवती इंद्रियाँ 
उसके मन को ही बलपूर्वक हर ले।।

अध्याय-2, श्लोक-59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ॥ ५९ ॥
देहधारी जीव इन्द्रियभोग से भले ही निवृत्त हो जाय पर उसमें इन्द्रियभोगों की इच्छा बनी रहती है। लेकिन उत्तम रस के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बंद करने पर वह भक्ति में स्थिर हो जाता है।
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इंद्रियों को वश में कर ले जीव जब 
तब वह इन भोगों से तो बच जाए।
पर भोगने की इच्छा बनी रह जाती 
जो न जाने कब फिर से उभर आए।।

लेकिन जब जीव भक्ति का उत्तम रस 
जीवन में एक़बार जो अनुभव करता है।
तब तुच्छ रस की लालसा मिट जाती 
वह फिर इसी रस  में ही स्थिर रहता है।।

अध्याय-2, श्लोक-58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८॥
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को संकुचित करके खोल के भीतर कर लेता है, उसी तरह जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को इन्द्रियविषयों से खींच लेता है, वह पूर्ण चेतना में दृढ़तापूर्वक स्थित होता है।
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अपने अंगों को कछुआ समय देख  
जैसे  समेटता और  प्रकट करता है।
भाँप शत्रुओं को आसपास जिसतरह  
अंगों को अपने भीतर खींच लेता है।।
 
वैसा ही वश जिसका हो इंद्रियों पर 
जो विषयों से मन को खींच सकता है।
वही आत्मसंयमी दृढ़ संकल्प के साथ 
सदा ही पूर्ण चेतना में स्थिर होता है।।

अध्याय-2, श्लोक-57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
इस भौतिक जगत में जो व्यक्ति न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न अशुभ के प्राप्त होने पर उससे घृणा करता है, वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है।
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शुभ अशुभ क्षणों से भरे जगत में 
जो इनसे प्रभवित नही होता है।
शुभ में भी हर्ष होता नही उसको 
न अशुभ से ही वह द्वेष करता है।।

हर्ष और द्वेष के द्वंद्व से ऊपर उठा  
उसका चित्त सदा निर्मल रहता है।
ऐसी जिसकी प्रकृति होती जग में 
वही  पूर्ण ज्ञान में स्थिर  होता है।।


अध्याय-2, श्लोक-56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥
जो त्रय तापों के होने पर भी मन में विचलित नहीं होता अथवा सुख में प्रसन्न नहीं होता और जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर मन वाला मुनि कहलाता है।
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दुःख की घड़ियाँ भी जिनको 
विचलित नही कर पाती है।
सुख प्राप्ति की प्रसन्नता भी 
जिनके भीतर से मिट जाती है।।

किसी से आसक्ति नही रहती 
भय क्रोध से ऊपर उठ जाते हैं।
मन होता जिनका शांत व स्थिर 
ऐसे व्यक्ति ही मुनि कहलाते हैं।।

अध्याय-2, श्लोक-55

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
श्रीभगवान ने कहा-हे पार्थ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में संतोष प्राप्त करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है।
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श्रीभगवान ने कहा कि हे पार्थ मनोरथ 
उत्पन्न करती इन्द्रियतृप्ति की कामनाएँ।
जो मनुष्य कामनाओं का कर परित्याग 
अपने मन को विरक्त, विशुद्ध कर पाए।।

समेट सारी दुनिया से विचारों को अपने 
जो आत्मा के अंदर ही संतोष,सुख पाए।
जिनकी चेतना होती ऐसी दिव्य व शुद्ध  
वे दिव्य पुरुष ही स्थितप्रज्ञ हैं कहलाए।।

अध्याय-2, श्लोक-54

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ॥ ५४ ॥
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! अध्यात्म में लीन चेतना वाले व्यक्ति (स्थितप्रज्ञ) के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है तथा उसकी भाषा क्या है? वह किस प्रकार बैठता तथा चलता है?
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कहा अर्जुन ने अब श्रीकृष्ण से कि 
प्रभु उस व्यक्ति के लक्षण बताए।
जिनकी चेतना होती आध्यात्मिक 
जो अपनी बुद्धि को स्थिर कर पाए।।

किस प्रकार की होती है उनकी बोली 
और किस भाषा का वे प्रयोग हैं करते?
उठने-बैठने की उनकी क्या विशेषता 
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति  किस तरह चलते हैं?

अध्याय-2, श्लोक-53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥
जब तुम्हारा मन वेदों की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाए, तब तुम्हें दिव्य चेतना प्राप्त हो जाएगी।
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वेदों के कर्म-विधान का ज्ञान जब 
मन को और विचलित न कर पाए।
भटकन के प्रभवित हुए बिना जब 
बुद्धि शांत भाव में स्थित हो जाए।।

मन व बुद्धि के इस सुंदर सुयोग में 
आत्म साक्षात्कार सम्भव हो पाता है।
फिर आती है जीवन में  परम स्थिति 
जब मानव परमात्मा का हो जाता है।।