Tuesday, August 1, 2017

अध्याय-10, श्लोक-27

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ ।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥ २७ ॥
घोड़ों में मुझे उच्चःश्रवा जानो, जो अमृत के लिए समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हुआ था। गजराजों में मैं ऐरावत हूँ तथा मनुष्यों में राजा हूँ।
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मुझे उच्चःश्रवा जानो  
समस्त घोड़ों के मध्य में 
निकला था जो अमृत हेतु
समुद्र मंथन के उपलक्ष्य में ।

हाथियों के मध्य में मैं 
समुद्र से उत्पन्न ऐरावत हूँ 
मनुष्यों के बीच में मैं 
नरपति प्रजा पालक हूँ ।।

अध्याय-10, श्लोक-26

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
मैं समस्त वृक्षों में अस्वत्थ वृक्ष हूँ तथा देवर्षियों में नारद हूँ। मैं गंधर्वों में चित्ररथ हूँ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।
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वृक्षों के बीच में मैं
वृक्ष हूँ पीपल का
देव ऋषियों में मैं
भक्त शिरोमणि नारद।

सभी गंधर्वों में हूँ
मैं चित्ररथ गंधर्व
सिद्ध पुरुषों में कपिल
सांख्ययोग विशारद ।।

Monday, July 31, 2017

अध्याय-10, श्लोक-25

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में दिव्य ओंकार हूँ, समस्त यज्ञों में पवित्र नाम का कीर्तन (जप) तथा समस्त अचलों में हिमालय हूँ।
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महर्षि भृगु हूँ मैं जितने भी 
महर्षियों के हैं यहाँ प्रकार
वाणी के मध्य से हूँ आदि 
दिव्य,पवित्र,अक्षर ओंकार ।

जितने भी यज्ञों की है चर्चा
उनमें हूँ नाम जप यज्ञ विमल 
न चलनेवालों की श्रेणी में से 
मानो मुझे हिमालय अचल।।

अध्याय-10, श्लोक-24

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
हे अर्जुन ! मुझे समस्त पुरोहितों में मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो। मैं ही समस्त सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ और समस्त जलाशयों में समुद्र हूँ।
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हे पार्थ! पुरोहितों के बीच 
मैं ही हूँ मुख्य पुरोहित बृहस्पति 
सेनानायकों के मध्य शिव पुत्र 
कार्तिकेय,देवताओं का सेनापति।


यूँ तो मुझसे ही हैं सृष्टि के 
समस्त जल और उसके स्रोत 
फिर भी जलाशयों के बीच 
समुद्र हूँ सदा जल से ओतप्रोत।।

अध्याय-10, श्लोक-23

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥ २३ ॥ 
मैं समस्त रुद्रों में शिव हूँ, यक्षों में तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता (कुबेर) हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतों में मेरु हूँ।
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रुद्रों की श्रेणी में मैं 
सदाशिव शंकर हूँ 
यक्षों राक्षसों के मध्य 
धन का स्वामी कुबेर हूँ ।

वसुओं के मध्य से 
अग्नि मुझे ही जानो 
समस्त पर्वतों के बीच 
मुझे मेरु पर्वत मानो।

अध्याय-10, श्लोक-22

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ तथा समस्त जीवों की जीवनी शक्ति हूँ।
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चारों वेदों के बीच चुनो
तो मैं उनमें सामवेद हूँ
राजाओं की श्रेणी में से
मैं स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ।

सभी इंद्रियों के मध्य मैं
चंचल चलायमान मन हूँ
जीवों की जीवनी शक्ति
मैं हूँ बनाता उन्हें चेतन हूँ।।

Tuesday, July 11, 2017

अध्याय-10, श्लोक-21

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
मैं आदित्यों में विष्णु, प्रकाशों में तेजस्वी सूर्य, मरूतों में मरीचि तथा नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।
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बारह आदित्यों की श्रेणी में 
मैं विष्णु हूँ प्रधान आदित्य 
जितने भी ज्योतिपुँज जग में 
उन सबमें हूँ मैं तेजस्वी सूर्य।

मैं वायु का अधिष्ठाता मरीचि 
जितने भी है वायु प्रवाहमान
नक्षत्रों की टोली में हूँ मैं चंद्रमा 
सौम्य, शीतल, प्रकाशवान।।

अध्याय-10, श्लोक-20

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
हे अर्जुन! मैं समस्त जीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अंत हूँ।
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हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों के
हृदय में सदा ही स्थित रहता हूँ
परमात्मा रूप में रहकर भीतर
मैं ही हर जीव को चेतना देता हूँ।

मुझसे ही सबकी हुई है उत्पत्ति
मैं ही उनका भरण भी करता हूँ
मैं उनके जीवन का कारण और
मैं ही मृत्यु का कारण बनता हूँ।।

अध्याय-10, श्लोक-19

श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
श्रीभगवान ने कहा-हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा क्योंकि हे अर्जुन! मेरा ऐश्वर्य असीम है।
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हे कुरुश्रेष्ठ! मेरे तो ऐश्वर्य अनंत
सबको यहाँ कहा न जा सकता
इतना विस्तार मेरे व्यक्तित्व का
कि समय में वो समा न सकता।

भगवान ने कहा अर्जुन से कि
बता रहे हैं अब वे अपने वैभव
बताएँगे मुख्य-मुख्य ही क्योंकि
सबको बता पाना नहीं है संभव ।।

Saturday, June 24, 2017

अध्याय-10, श्लोक-18

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ॥ १८ ॥
हे जनार्दन! आप पुनः विस्तार से अपने ऐश्वर्य तथा योगशक्ति का वर्णन करें। मैं आपके विषय में सुनकर कभी भी तृप्त नहीं होता हूँ क्योंकि जितना ही आपके विषय में सुनता हूँ, उतना ही आपके शब्द-अमृत को चखना चाहता हूँ।
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आपके विषय में जितना मैं सुनूँ  
उतनी ही बढ़ती जाती लालसा
इस अतृप्त हृदय को सदा रहती 
इन अमृत वचनों की अभिलाषा।

हे जनार्दन! जग के स्वामी प्रभु 
अपने ऐश्वर्यों को पुनः बताए 
अपनी योगशक्ति के विषय में 
तनिक फिर से हमें समझाएँ ।।

अध्याय-10, श्लोक-17

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
हे कृष्ण! हे परम योगी! मैं किस तरह आपका चिंतन करूँ और आपको कैसे जानूँ? हे भगवान! आपका स्मरण किन-किन रूपों में किया जाय?
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हे योगेश्वर! हे भगवन! बताए 
कैसे हम आपको जान पाए 
कैसे मन आप में हम लगाए 
कैसे आपका चिंतन कर पाए?

किस-किस भाव में भजे हम 
किस-किस रूप का ध्यान धरे 
कैसे हम आपको जाने-पहचाने 
आपको पाने के लिए क्या करे?

अध्याय-10, श्लोक-16

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्वर्यों को बताएँ जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं।
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कैसे रहते हैं आप व्याप्त
इस सृष्टि के कण-कण में
समस्त लोकों में हर समय
उपस्थित कैसे हर क्षण में।

ये अलौकिक दिव्य ऐश्वर्य
प्रभु हमें विस्तार से बताए
आपके सिवा कौन समर्थ
जो हमें ये वैभव समझाए।।

Wednesday, June 21, 2017

अध्याय-10, श्लोक-15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
हे परमपुरुष, हे सबके उद्गगम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे ब्रह्मांड के प्रभु! निस्सन्देह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अंतरंगाशक्ति से जानने वाले हैं।
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हे पुरुषोत्तम, हे सबके आदि प्रभु 
ब्रह्मांड नायक हे  सृष्टि के स्वामी
हे देवों के देव हे आदिदेव भगवन 
स्वतंत्र, स्वराट आप प्रभु अंतर्यामी।

एकमात्र आप ही स्वयं को जानते 
अन्य कोई नहीं है इस त्रिभुवन में।
आप चाहो तो कोई जाने आपको 
जब देते ज्ञान आप बैठ अंतर्मन में।।

Tuesday, June 20, 2017

अध्याय-10, श्लोक-14

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
हे कृष्ण! आपने मुझसे जो भी कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ। हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं।
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हे केशव! जो भी कहा है आपने 
सब पर ही पूरा विश्वास रखता हूँ 
आप के हर शब्द हर अक्षर को 
मैं पूर्ण रूप से स्वीकार करता हूँ।

हे प्रभु!आपके दिव्य स्वरूप को 
कोई भी नहीं  समझ सकता है 
चाहे वो शक्तिशाली असुर है  
या फिर चाहे वह मृदु देवता है।।

अध्याय-10, श्लोक-12-13

अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌ ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌ ॥ १२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
अर्जुन ने कहा-आप परम भगवान, परमधाम, परमपवित्र, परम सत्य हैं। आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं।
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र्जुन बोले हे भगवन! आप ही
परम ईश्वर आप परम आश्रय हो 
परम शुद्ध परम पावन आप ही 
परमसत्य हर चेतना के विषय हो।

शाश्वत सनातन पुरुष हैं आप प्रभु 
दिव्य, अलौकिक अजन्मा है आप 
आप सारे देवताओं के आदि देव 
आप ही तो हैं  विभु सर्वत्र व्याप्त।

नारद, असित, देवल और व्यास 
सबकी यही मति है आपको लेकर 
आप ने भी पुष्टि कर ही दी इसकी  
आज ये परम ज्ञान स्वयं मुझे देकर।

अध्याय-10, श्लोक-11

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं           तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
मैं उन पर विशेष कृपा करने के हेतु उनके हृदयों में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ।
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ऐसे अनन्य शुद्ध भक्तों पर
होती है मेरी भी कृपा विशेष
भक्ति की सहूलियत देने में
छोड़ता नहीं मैं कुछ भी शेष।

इनके हृदयों में वास कर मैं
उन्हें सदा प्रकाशित हूँ करता
ज्ञान के आलोक से मैं इनके
अज्ञान के अंधकार हर लेता।।

Friday, June 16, 2017

अध्याय-10, श्लोक-10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ ।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरंतर लगे रहते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं।
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मुझसे मन जुड़ गया जिनका 
मेरा ही भजन करे जो निरंतर 
प्रेम पूर्वक मेरा स्मरण करते 
मुझसे ही आप्लावित अंतर।

ऐसे मधुर भक्त मुझसे दिव्य 
ऐसा बुद्धियोग प्राप्त करते हैं  
जिसके द्वारा वे सहजता से  
मुझ परमेश्वर तक आ सकते हैं।

अध्याय-10, श्लोक-9

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌ ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परम संतोष तथा आनंद का अनुभव करते हैं।
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मुझमें चित्त लगा है जिनका 
उनके मन मुझमें वास करते हैं 
परस्पर मेरी कथा लीला गान 
इन कार्यों में ही लगे रहते हैं।

मेरी सेवा में जीवन समर्पित 
कुछ और इच्छा न होती उनकी 
आनंद में रमण करते हैं सदा वे 
लग जाती मुझमें मति जिनकी।।

अध्याय-10, श्लोक-8

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥
मैं समस्त आध्यात्मिक और भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत है। जो बुद्धिमान ये भलीभाँति जानते हैं, वे मेरी प्रेमभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं।
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मैं ही कारण सम्पूर्ण जगत का 
भौतिक हो या हो आध्यात्मिक
मुझसे ही उत्पन्न होकर ये सब 
मेरी शक्ति से ही होते कार्यान्वित।

विद्वान पुरुष इन सबको जान 
मेरी प्रेमाभक्ति में लगा रहता है 
मेरी अराधना में तत्पर वो रह 
निरंतर मेरा ही स्मरण करता है।।

अध्याय-10, श्लोक-7

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
जो मेरे इस ऐश्वर्य तथा योग से पूर्णतया आश्वस्त है, वह मेरी अनन्य भक्ति में तत्पर होता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
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मेरे ये ऐश्वर्य योग व शक्ति 
जो कोई तत्त्व से जान लेता 
मुझसे ही सब,जो दृष्टिगोचर 
मन से जो कोई ये मान लेता।

वह पाता है मेरी अनन्य भक्ति 
भकटना उसका फिर सम्भव नही 
बना रहता भक्ति पथ पर अडिग
नहीं है इसमें कोई संशय कहीं।

अध्याय-10, श्लोक-6

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
सप्तर्षिगण तथा उनसे भी पूर्व चार अन्य महर्षि एवं सारे मनु (मानवजाति के पूर्वज) सब मेरे मन से उत्पन्न हैं और विभिन्न लोकों में निवास करने वाले जीव उनसे अवतरित होते हैं।
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सप्तर्षिगण हो या उनसे पहले 
प्रकट हुए सनकादि चारों कुमार 
मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं ये सब 
मैं ही हूँ इनका एकमात्र आधार।

सारे मनु भी मेरे मन से हैं जन्मे 
जिनसे ये मानव जाति आयी है 
कोई भी मुझसे विलग नहीं यहाँ 
ये सारी सृष्टि मेरी ही बनायी है।।

Thursday, June 15, 2017

अध्याय-10, श्लोक-4-5

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५॥
बुद्धि, ज्ञान, संशय तथा मोह से मुक्ति, क्षमाभाव, सत्यता, इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह, सुख तथा दुःख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश तथा अपयश-जीवों के ये विविध गण मेरे ही द्वारा उत्पन्न हैं।
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संशय मिटानेवाली बुद्धि 
मोह से मुक्त करे जो ज्ञान 
क्षमा व सत्य का आचरण 
स्थिर मन,इंद्रियों पे नियंत्रण।

जन्म मृत्यु का कारण 
सुख दुःख की अनुभूति
भय अभय की चिंता 
यश अपयश की प्राप्ति।

तपस्या की शक्ति और 
अहिंसा व समता का भाव 
दान की प्रवृत्ति और 
संतुष्ट होनेवाला स्वभाव।

इन सबके पीछे का कारण 
मनुष्यों के विभिन्न स्वभाव 
मुझसे से सब उत्पन्न होते 
मुझसे से मिलते हैं सारे भाव।।

अध्याय-10, श्लोक-3

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त लोकों के स्वामी के रूप में जानता है, मनुष्यों में केवल वही मोहरहित और समस्त पापों से मुक्त होता है।
*******************************
मैं हूँ जन्म-मृत्यु से परे अजन्मा 
मैं हूँ समस्त लोकों का स्वामी 
मेरा कोई आरम्भ या अंत नहीं 
मैं आदि अंत से परे हूँ अनादि।

मरणशील मनुष्यों में से जो इन 
बातों को समझ व जान लेता है 
मोह में वो फिर पड़ता नहीं कभी 
सारे पापों से भी मुक्त होता है।।

अध्याय-10, श्लोक-2

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारण स्वरूप (उद्गगम) हूँ।
*********************************
न देवी देवता न महान महर्षि 
कोई भी मुझे कहाँ जान पाए 
मेरा ऐश्वर्य और मेरा प्रभाव 
भलीभाँति कोई समझ न पाए।

क्योंकि सभी देवी देवता और 
ऋषि मुनियों के समस्त प्रकार 
सबको उत्पन्न मैंने ही है किया
मैंने ही दिया आकार व आहार।

अध्याय-10, श्लोक-1

श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
श्री भगवान ने कहा-हे महाबाहु अर्जुन! और आगे सुनो। चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताए गए ज्ञान में श्रेष्ठ होगा।
********************************
श्री भगवान ने कहा अर्जुन से
ग्रहण करो मेरे ये परम उपदेश
दे रहा हूँ मैं ये दिव्य परम ज्ञान
तुम्हें अपना प्रिय व सखा देख।

हे महाबाहु ! तुम्हारे हित में ही
ये ज्ञान तुम्हें मैं बतला रहा हूँ
उन सब में ही श्रेष्ठ है ये ज्ञान
जितनी बातें अब तक कहा हूँ।।

Thursday, February 16, 2017

अध्याय-9, श्लोक-34

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ॥ ३४ ॥
अपने मन को मेरे नित्य चिंतन में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो। इस प्रकार मुझमें पूर्णतया तल्लीन होने पर निश्चित रूप से मुझको प्राप्त होगे।
**********************************
मन को मेरे चिंतन में लगाओ 
मेरे नाम,रूप का भजन करो।
नित स्मरण, नमन, पूजन, वंदन 
हर तरह से मन को मुझमें धरो।।

ऐसे करते जब मन पूरी तरह से 
मेरे में तल्लीन हो जाएगा तेरा।
पूर्ण शरणागति की उस स्थिति में 
प्राप्त होगा फिर तुझे संग मेरा।।

****** परम गुह्य ज्ञान नाम का नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ*******

अध्याय-9, श्लोक-33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌ ॥३३॥
फिर धर्मात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो कहना ही क्या है! अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आप को लगाओ।
************************************
फिर वे कितने प्रिय हैं क्या बताऊँ 
जो सदा ही मझमें ही डूबे है रहते।
वो धर्मात्मा ब्राह्मण, वो मेरा भक्त 
और राजर्षि जो सदा मुझे हैं भजते।।


इसलिए इस संसार में समय न गँवा 
ये सब क्षण भर में नष्ट होनेवाला है।
दुःख भरे इस संसार से निकल शीघ्र 
तू हर पल निरंतर मेरा ही स्मरण कर।।

अध्याय-9, श्लोक-32

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌ ॥ ३२ ॥ 
हे पार्थ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निन्मजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (श्रमिक) क्यों न हो, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं।
**************************************
हे पार्थ!भक्ति में भेदभाव नहीं 
हर भक्त समान है मेरे लिए।
कोई भी शरण में आ जाए मेरे 
बस मन में भक्ति भाव लिए।।

मैं न देखता कुल,जन्म व धर्म 
मैं तो सबको अपना लेता हूँ।
भक्त स्त्री, वैश्य या शूद्र हो 
सबको ही परम धाम देता हूँ।।

अध्याय-9, श्लोक-31

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
वह तुरंत धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शांति प्राप्त करता है। हे कुंतिपुत्र! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है।
************************************
जल्दी ही वो पथ पर लौटेगा 
शुद्धता का हर आचरण करेगा।
परम शांति प्राप्त होगी उसको 
भक्ति से कभी न वो भटकेगा।।


हे अर्जुन! आज तुम बता दो सबको 
कर दो घोषणा मेरी तरफ़ से आज।
मेरे भक्त का कभी विनाश न होता
मैं आने नहीं देता उनपर कभी आँच।।

मैं रखूँ सदा उसकी भक्ति का लाज 
सम्भाल लूँगा मैं स्वयं,उसे जो गिरा।
लड़खाएँगे कदम तो भी क्या हुआ 
गिरने न दूँगा,नाता उसका मुझसे जुड़ा।।

अध्याय-9, श्लोक-30

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्‌ ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
यदि कोई जघन्य से जघन्य कर्म करता है, किंतु यदि वह भक्ति में रत रहता है तो उसे साधु मानना चाहिए क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है।
**************************************
मेरी भक्ति में जो है लगा 
क्षणभर को अगर वह डिगा।
दुराचार हो गया उससे अगर 
पर मन भक्ति से ही है भीगा।।

ऐसे को साधु ही समझो तुम 
क्योंकि भक्ति उसने छोड़ी नहीं।
ग़लती से ग़लती हो गयी उससे 
मैं स्वयं करूँगा उसको सही।।

अध्याय-9, श्लोक-29

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥ २९ ॥ 
मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ। मैं सबों के लिए समभाव हूँ। किंतु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ।
***********************************************
न मैं किसी से द्वेष करूँ
न ही किसी से पक्षपात।
मेरे लिए तो सब हैं समान 
सब ही अपने संगी साथ।।

हाँ,जो मुझसे प्रेम करे और 
दिन रात मुझे ही जो भजे।
उसके हृदय में नित मैं बसूँ   
मेरा हृदय भी उसे न तजे।।

अध्याय-9, श्लोक-28

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
इसतरह तुम कर्म के बंधन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे। इस संन्यास योग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे।
***************************************
इसतरह अपने सारे कर्म जब
तुम मुझमें समर्पित कर दोगे ।
तब कर्म व उसके शुभ-अशुभ
सारे फलों से तुम मुक्त होगे।।

सांसारिक भोगों से विरक्ति
और मन मुझमें ही लगाएगा।
तब हर बंधन से छूटकर जीव
मेरे पास वापस आ जाएगा।।

Tuesday, January 24, 2017

अध्याय-9, श्लोक-27

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌ ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌ ॥ २७ ॥
हे कुंतीपुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो।
**********************************
हे कुंतीपुत्र!तुम जो भी करो 
हर काम में मेरा ध्यान धरो।
जो खाते हो, यज्ञ करते हो 
सब पहले मुझे अर्पित करो।।

दान देते हो किसी को या 
तुम कोई तपस्या ही करो।
अपने सारे कर्मों को मुझे 
समर्पित करते हुए करो।।

अध्याय-9, श्लोक-26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।
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प्रेम से भरकर एक पत्ता या   
एक फूल ही कोई चढ़ा दे।
कुछ नहीं तो जल ले आए 
या एक फल भोग लगा दे।।

प्रेम और भक्ति से भरा हर
चीज़ स्वीकार मैं कर लूँगा।
इससे रहित कोई भी वस्तु 
अपने पास नहीं मैं रखूँगा।।

अध्याय-9, श्लोक-25

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌ ॥ २५ ॥
जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे, जो पितरों को पूजते हैं, वे पितरों के पास जाते हैं, जो भूत-प्रेतों की उपासना करते हैं, वे उन्ही के बीच जन्म लेते हैं और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ निवास करते  हैं।
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जो पूजते हैं देवी-देवताओं को 
उनको देवलोक प्राप्त होता है।
पितरों की पूजा करनेवाला तो 
अंत में पितृलोक ही पाता है।।

जो करे भूत-प्रेत की उपासना 
वो उनके बीच ही जन्मता है।
परंतु जो ध्याता है मुझको वो 
मेरे साथ मेरे धाम में रहता है।।

अध्याय-9, श्लोक-24

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥
मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी हूँ। अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वभाव को नहीं पहचान पाते, वे नीचे गिर जाते हैं।
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जितने भी यज्ञ किए जाते हैं 
मैं ही उन सबका भोक्ता हूँ।
मैं ही हूँ इस जगत का स्वामी 
मैं ही पालन-पोषण करता हूँ।।

जो लोग मेरे इस वास्तविक 
स्वभाव को नही जान पाते हैं।
कामनाओं जाल में फँसकर 
बारबार पुनर्जन्म को पाते हैं।।

अध्याय-9, श्लोक-23

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌ ॥ २३ ॥
हे कुंतीपुत्र! जो लोग अन्य देवताओं के भक्त हैं और उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, वास्तव में वे भी मेरी पूजा करते हैं, किंतु वे यह त्रुटिपूर्ण ढंग से करते हैं।
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हे कुंतीपुत्र! जो लोग अन्य  
देवी-देवताओं के भक्त हैं।
उनकी पूजा में ही लगे रहते 
श्रद्धा उनमें ही आसक्त है।।

पर वास्तव में ऐसे लोग भी 
मेरी ही पूजा किया करते हैं।
अज्ञानता के कारण वे रास्ता
त्रुटियों वाला पकड़ लेते हैं।।

अध्याय-9, श्लोक-22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥ २२॥
किंतु जो लोग अनन्य भाव से मेरे दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए निरंतर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ।
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हरपल जो करते मेरा चिंतन
अनन्य भाव से मुझे है भजते।
मैं ही लक्ष्य होता हूँ जिनका
जो निरंतर मुझे ही हैं पूजते।।

ऐसे लोगों के ज़िम्मेदारी को
मैं स्वयं अपने पर उठाता हूँ।
जो है उसकी रक्षा करता और
जो न हो उसे लाकर देता हूँ।।

Sunday, January 15, 2017

अध्याय-9, श्लोक-21

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना 
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
इसप्रकार जब वे (उपासक) विस्तृत स्वर्गीय इन्द्रिय भोग को भोग लेते हैं और उनके पुण्य कर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तो वे इस मृत्युलोक में पुनः लौट आते हैं। इसतरह जो तीन वेदों के सिद्धांतों में दृढ़ रहकर इन्द्रिय सुख की गवेषना करते हैं, उन्हें जन्म-मृत्यु का चक्र ही मिल पाता है।
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जीव विशाल स्वर्ग लोक पहुँच
वहाँ के सुखों का भोग करता है।
जैसे ही पुण्य समाप्त हो जाता  
वापस यहाँ आना ही पड़ता है।।

इसतरह जो वेदों के अनुसार चल 
बस इन्द्रिय सुख के लिए जीते हैं।
वे ऐसे ही प्रयास और प्राप्ति करते 
जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़े रहते हैं।।

अध्याय-9, श्लोक-20

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ॥ २० ॥
जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषना करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं। वे पापकर्मों से शुद्ध होकर, इंद्र के पवित्र स्वर्गिक धाम में जन्म लेते हैं, जहाँ देवताओं का सा आनंद भोगते हैं।
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तीनों वेदों के अनुसार जो भी 
यज्ञ द्वारा मेरी पूजा करते हैं।
पूजा से पवित्र हो सोम रस 
वाले स्वर्ग की प्रार्थना करते हैं।

ऐसे लोग फिर पुण्य प्राप्त कर 
स्वर्ग लोक तक पहुँच जाते हैं।
इंद्र के उस लोक में जाकर वे 
देवताओं के सारे सुख पाते हैं।।

अध्याय-9, श्लोक-19

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
हे अर्जुन! मैं ही ताप प्रदान करता हूँ और वर्षा को रोकता तथा लाता हूँ। मैं अमरत्व हूँ और साक्षात मृत्यु भी हूँ। आत्मा तथा पदार्थ (सत् तथा असत्) दोनों मुझ ही में हैं।
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हे अर्जुन! मुझसे ही ताप मिले
मैं ही जगत में वर्षा भी लाता।
मैं ही सूरज की गर्मी और मैं ही
बूँदों की शीतलता बन जाता।।

कभी न नष्ट हो वो अमरत्व मैं
मैं ही हूँ सर्वहारी मृत्यु साक्षात।
मैं ही सत्य रूप में आत्मा होता
और सत्य रूप में मैं ही पदार्थ।।

Tuesday, January 10, 2017

अध्याय-9, श्लोक-18

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌ ॥ १८ ॥
मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यंत प्रिय मित्र हूँ। मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ।
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मैं ही प्राप्त करने योग्य परम लक्ष्य 
मैं ही करता हूँ सबका भरण-पोषण।
मुझसे सी सब जीव हुए हैं उत्पन्न 
मैं ही हूँ सबका अविनाशी कारण।।

मैं ही स्वामी व अच्छे-बुरे का साक्षी 
मैं ही सबका गंतव्य परम धाम हूँ।
जहाँ ले सकते हैं सारे जीव शरण 
मैं ही एकमात्र वह परम विश्राम हूँ।।

अटूट प्रेम करनेवाल मित्र हूँ सबका 
मैं सृष्टि करता, मैं ही प्रलय करता।
मैं ही आधार जग व  जगवालों का
मैं ही इन सबको आश्रय हूँ  देता।।

अध्याय-9, श्लोक-17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
मैं इस ब्रह्मांड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ। मैं ही ज्ञेय (जानने योग्य), शुद्धिकर्त्ता तथा ओंकार हूँ। मैं ही ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद हूँ।
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मैं ही हूँ पालनकर्त्ता पिता 
मैं ही  सबकी जननी माता।
मैं ही वो मूल स्रोत पितामह 
मैं ही हूँ सबका आश्रयदाता।।

मैं ही हूँ जानने योग्य जग में 
मैं ही शुद्धिकर्त्ता व ओंकार हूँ।
मैं ही हूँ ऋग्वेद और सामवेद 
मैं ही यजुर्वेद का आधार हूँ।।

अध्याय-9, श्लोक-16

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥ १६ ॥
किंतु मैं ही कर्मकांड, मैं ही यज्ञ, पितरों को दिया जाने वाला तर्पण, औषधि, दिव्य ध्वनि (मंत्र), घी, अग्नि तथा आहुति हूँ।
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मैं ही हूँ कर्मकांड 
मैं यज्ञ कहलाता हूँ।
मैं ही औषधि, मैं ही 
पितरों का तर्पण होता हूँ।।

मैं ही हूँ मंत्र भी 
मैं ही घृत भी हूँ।
मैं ही हूँ अग्नि 
मैं ही आहुति हूँ।।

Monday, January 9, 2017

अध्याय-9, श्लोक-15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्व रूप में करते हैं।
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ज्ञान के अनुशीलन द्वारा कुछ  
लोग यज्ञ कार्य में लगे रहते हैं।
कुछ मुझे एक ही तत्त्व जानकर 
अद्वय रूप में मुझको पूजते हैं।।

अलग-अलग तत्त्व मानकर कुछ 
मनुष्य द्वैतभाव से मुझे भजते हैं।
अनेक विधियाँ हैं पूजा की कुछ   
मेरे विश्व रूप की पूजा करते हैं।।

Saturday, January 7, 2017

अध्याय-9, श्लोक-14

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए दृढ़संकल्प के साथ प्रयास करते हुए, मुझे नमस्कार करते हुए, भक्तिभाव से निरंतर मेरी पूजा करते हैं।
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ऐसे महात्माजन दृढ़ता पूर्वक  
मेरी महिमा का गान करते हैं।
ऐसे ही चलता रहे ये गुणगान  
निरंतर इसी प्रयास में रहते हैं।।

सदा मेरी भक्ति में स्थित होते   
बारम्बार मुझे नमस्कार करते।
भक्ति भाव से भरा होता ह्रदय 
निरंतर मेरी पूजा में लगे रहते।।

अध्याय-9, श्लोक-13

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌ ॥ १३ ॥
हे पार्थ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान के रूप में जानते हैं।
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हे पार्थ! मोह से हैं मुक्त महात्मा 
वे सब मेरी शरण ग्रहण करते हैं।
भौतिक प्रकृति के कष्ट से दूर वे 
दैवी प्रकृति से संरक्षित रहते हैं।।

पूरी तरह मेरी भक्ति में निमग्न 
अनन्य भाव से मुझे ही भजते हैं।
मैं ही हूँ सभी जीवों का उद्ग़म 
ये सत्य भलीभाँति वे जानते हैं।।

अध्याय-9, श्लोक-12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
जो लोग इसप्रकार मोहग्रस्त होते हैं , वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के प्रति आकृष्ट रहते हैं। इस मोहग्रस्त अवस्था में उनकी मुक्ति-आशा, उनके सकाम कर्म तथा ज्ञान का अनुशीलन सभी निष्फल हो जाते हैं।
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इसप्रकार मोहित होनेवाले लोग
किसी भी क्षेत्र में सफल न होते।
मुक्ति का पथ हो या सकाम कर्म
या ज्ञान, हर जगह निष्फल होते।।

भौतिक प्रकृति की माया में फँस
उसके जाल में ही उलझे रहते हैं।
आसुरी व्यवहार, नास्तिक विचार 
यही सब उन्हें आकर्षित करते हैं।।